विपश्यना - कामवासना से मुक्ति का वैग्यानिक रास्ता


कामवासना मानवमन की सबसे बड़ी दुर्बलता है । जिन तीन तृष्णाओं के कारण वह भवनेत्री में बंधा रहता है उसमें कामतृष्णा प्रथम है , प्रमुख है । माता पिता के काम संभोग से मानव की उत्पत्ति होती है । अतः अंतर्मन की गहराइयों तक कामभोग का प्रभाव छाया रहता है । इसके अतिरिक्त अनेक जन्मों के संचित स्वयं अपने काम संस्कार भी साथ चलते ही हैं । अतः मुक्ति के के पथ पर चलने वाले व्यक्ति के लिए काम भोग के संस्कारों से छुटकारा पाना बहुत कठिन होता है । विपश्यना करनी न आए तो असंभव ही हो जाता है ।
काम वासनाओं से छुटकारा पा कर कोई व्यक्ति ब्रह्मचर्य का जीवन जीना चाहता है परंतु बार बार मन में वासना के तूफान उठते हैं और उसे व्याकुल बनाते हैं । कहीं ब्रह्मचर्य भंग न हो जाए इसलिए वह कठोरतापूर्वक वासनाओं का दमन करता है ओर परिणामतः अपने भीतर तनाव की ग्रंथियां बांधता है दमन द्वारा वासनाओं से मुक्ति मिलती नहीं । भीतर ही भीतर वासना उमड़ती कुलबुलाती रहती है और मन को मोहती रहती है। या दमन द्वारा ब्रह्मचर्य पालने वाला कोई विश्वामित्र जैसा साधक मेनका जैसी अप्सरा की रूप माधुरी पर फिसल जाता है तो आत्मग्लानि, आत्मक्षोभ और आत्मगर्हा से भर उठता है । ऐसा होने पर अपराध की ग्रथियां बांध बांध कर अपनी व्याकुलता को और बढ़ाता है ।
इसीलिए फ्रायड जैसे मनोविज्ञानवेत्ता ने कामवासना के दमन को मानसिक तनाव और व्याकुलता का प्रमुख कारण माना और काम भोग की खुली छूट को प्रोत्साहित किया । अनेक लोग इस मत के पक्षधर बने । आज के युग के कुछएक साधना सिखाने वाले लोग भी इस बहाव में बह कए । ऐसे लोगों ने रोग को तो ठीक तरह से समझा, पर रोग निवारण का जो इलाज ढूंढा, वह रोग के बढ़ाने का ही कारण बन बैठा । काम वासना का दमन एक अंत है , जो सचमुच रोग निवारण का सही उपाय नहीं है । परंतु उसे खुली छूट देना ऐसा दूसरा अंत है जो कि रोग निवारण की जगह रोग संवर्धन का ही काम करता है ।
जब कोई व्यक्ति बुद्ध बनता है तो तृष्णा के सभी बंधनों को भग्न करके विकार विमुक्ति के ऐश्वर्य का जीवन जीता है । इसीलिए वह भगवान कहलाने का अधिकारी होता है । ऐसा व्यक्ति काम तृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा , इन तीनों से छुटकारा पा लेता है और जिस विपश्यना विद्या ( भगवान बुद्ध की ध्यान की विधि ) द्वारा यह मुक्त अवस्था प्राप्त की , उसे ही करुण चित्त से लोगों को बांटता है ।
विपश्यना साधना की विधि न विकारों के दमन के लिए है और न उन्हें खुली छूट देने के लिए । विपश्यना विधि इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मंगल मार्ग है जो जागे हुए विकार को साक्षी भाव से देखना सिखाती है जिससे कि अतंर्मन की गहराइयों में दबे हुए काम विकारों को भी जड़ से उखाड़ना का काम शुरू हो जाता है कुशल विपश्यी साधक समय पाकर इस विधि में पारंगत होता है और कामविकारों का सर्वथा उन्मूलन कर लेता है । और सहज भाव से ब्रह्मयर्च का पालन करने लगता है । इसके अभ्यास में समय लगता है । बहुत परिश्रम , पुरूषार्थ , पराक्रम करना पड़ता है । परंतु यह पराक्रम देहदंडन का नहीं , मानस दमन का नहीं , बल्कि मनोविकारों को तटस्थ भाव से देख सकने की क्षमता प्राप्त करने का है जोकि प्रारम्भ में बड़ा कठिन लगता है पर लगन और निष्ठा से अभ्यास करते हुए साधक देखत है कि शनैः शनैः उसके मन पर वासना की गिरफ्त कम होती जा रही है ।दमन नहीं करने के कारण कोई तनाव भी नहीं बढ़ रहा है और समय पा कर सारे कामविकारों से मुक्त हो कर ब्रह्मचर्य का जीवन जीना सहज हो गया है । यह सब कैसे होता है । इसे समझें ।
पुरुष के लिए नारी के और नारी के लिए पुरुष के रूप, शब्द, गंध, रस और स्पर्शसे बढ़ कर अन्य कोई लुभावना आलंबन नहीं होता । यह पांचों आलंबन आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा कीं इंद्रियों पर आघात करते हैं अथवा इनकी याद और कल्पना चिंतन के रूप में मन की इंद्रिय पर आघात करती है तो ही वासना के विकार जगने का काम आंरंभ होता है । पहली पांचों इंद्रियां शरीर पर स्थापित है ही । छठी मन की इंद्रिय भी शरीर की सीमा के भीतर ही होती है । अतः विपश्यना साधना का अभ्याय साढ़े तीन हाथ की काया के भीतर ही किया जाता है बाहर नहीं । कामतृष्णा जहां जागती है, वहीं उसे जड़ से उखाड़ा जा सकता है, अन्यत्र नहीं । साढ़े तीन हाथ की काया में इंद्रिय सीमाक्षेत्र के भीतर इसकी उत्पत्ति होती है , यहींनिवास और संवर्धन होता है ।

अतः विश्यना द्वारा यहीं इसका उन्मूलन किया जा सकता है देखना यह है कि बाहर के आलंबन ने अपने भीतर क्या खट पट शुरू कर दी । आंख कान, नाक, जीभ और त्वचा पर रूप , शब्द गंध, रस और स्पर्ष का संपर्क होते ही यानी प्रथम आघात लगते ही अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर तत्संबंधित इंद्रिय दरवाजे पर और फिर सारे षरीर पर प्रकंपन होता हैं फस्स पच्चया वेदना स्पर्श होते हीं संवेदना होती है । जैसे कांसे के बर्तन को छू देने से उसमें झंकार की तरंगें उठती हैं इस प्रथम आघात के तुरंत बाद मानस का वह हिस्सा जिसे संज्ञा कहें याबुद्धि कहं वह अपने पूर्व अनुभव और याददाश्त के आधार पर इस आलंबन को पहचानता है ‘‘ यह पुरुष अथवा नारी का रूप , शब्द, गंध आदि है । और फिर उसका मूल्यांकन करता है ओह बहुत सुंदर है बहुत मधुर है, ऐसा करने पर षरीर पर होने वाली यह तरंगे प्रिय प्रतीत होने लगती हैं और मानस उनके प्रति राग रंजित हो कर उनमें डूबने लगता है । वेदना पच्चया तण्हा संवेदना से ही ( काम ) तृष्णा होती है । यही से वासना का दौर शुरू हो जाता है । बार बार रूप, शब्द गंध आदि संबंधित इंद्रियों से टकराते हैं , बार बार प्रिय मूल्यांकन होता है बार बार प्रतिक्रिया स्वरूप वासना के संस्कार बनते हैं । यों क्षण प्रतिक्षण एक के बाद एक वासना के संस्कार बनते बनते पत्थर की लकीर जैसे गहरे हो जाते हैं जब रूप, षब्द, गंध, रस आदि बाहर आलंबन प्रत्यक्षतः आंख, कान नाक आदि इंद्रिय द्वारों से संपर्क करना बंद कर देते हैं तो छठी इंद्रिय का दरवाजा खुल जाता है , अब मन की इंद्रिय पर पूर्व अनुभूत रूप, शब्द, गंध आदि के आंलबन कल्पना और चिंतन के रूप में टकराने लगते हैं, फिर वही क्रम चल पड़ता है । आघात से प्रकंपन का होना , फिर प्रिय मूल्यांकन, फिर संवेदना, फिर प्रतिक्रिया स्वरूप वासना के संस्कारों की उत्पत्ति । क्षण प्रतिक्षण चिंतन का आंलबन चित्तधारा से टकराता रहता है औरक्षण प्रतिक्षण वासना का संस्कार पैदा होता रहता है । यह क्रम जितनी देर चलता है , वासना उतनी बलवान होती जाती है ।

मन पर उमड़ती हुई यह तीव्र वासना वाणी और शरीर पर प्रकट कोने के लिए मचल उठती है । सारा का सारा चित्त वासना के प्रवाह में आमूल चूल डूब जाता है । वासना में डूबें हुए व्यक्ति की सति याने स्मृति ( यहां स्मृति का अर्थ याददाश्त नहीं है । ) यानि जागरूकता बनी रहती है वासना व्यथित व्यक्ति स्मृतिमान रहता है याने सजग रहता है । परंतु सजग रहता है केवल रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श अथवा चिंतन के आलंबन के प्रति ही । इन छह में से किसी न किसी आलंबन पर उसका ध्यान लगा रहा है । यही आलंबन का ध्यान वासना को उद्दीप्त करता है ।

अतः स्मृति रहते हुए भी इसे सम्यक स्मृति याने सही स्मृति नहीं कहते । मिथ्या स्मृति कहते है, सति मुट्ठा कहते हैं इन छह आलंबनों में से कोई एक भी तत्संबंधित इद्रिय द्वार के संपर्क में आता है तो स्वानुभव का काम शुरू हो जाता है । संपर्क होते हं तरंग रूपी वेदना को होना, संज्ञा द्वारा मूल्यांकन करना, संवेदना का प्रिय लगना और प्रिय संवेदना का रसास्वादन करते हुए वासना के संस्कार की प्रतिक्रिया का आंरंभ होना, यह सब स्वानुभूति का क्षेत्र है । अतः सत्य का क्षेत्र है । इसके प्रति सजग रहे तो स्मृति सम्यक है। केवल मात्र आलंबन के प्रति सजग रहे आलंबन के स्पर्श का भी निरीक्षण न कर सके, उसके आगे की स्वानुभूतियां तो दूर रहीं, तो स्मृति मिथ्या ही हुई, क्योंकि गहरी अनुभूति वाल क्षेत्र भुलाया हुआ है ।
स्मृति याने जारूकता जब सम्पजज्ज से जुड़ती है तो सम्यक हो पाती है । साधक आताप सम्जनानो सतिमा हो जाता है । इसी को विपश्यना कहते हैं । इसी को सतिपठ्टान कहते हैं याने सति का सम्यक रूप से स्वानुभूतिजन्य सत्य में प्रतिष्ठापित हो जाना । विपश्यी साधक यही करता हैं वह सत्यदर्शी होता है आत्मदर्शी होता है। आत्मदर्शी के माने जिसका कभी स्वयं अनुभव किया ही नहीं ऐसी सुनी सुनाई, पढ़ी पढ़ाई दार्शनिक मान्यता वाली कल्पित आत्मा का दर्शन करना नहीं । यहां आत्मदर्शन का अर्थ है स्वदर्शन । अनुभूतियों के स्तर पर अपने बारें में जिस जिस क्षण जो जो सच्चाई प्रकट हो उसे ही साक्षीभाव से देखना सत्यदर्शन है , स्वदर्शन है । आत्मदर्शन है । मुक्ति का सहज उपाय है । किसी कल्पना का ध्यान मन को कुछ देर के लिए भरमाए भले ही रखे पर विकार विमुक्त नहीं कर सकता । कोरे बौद्धिक अथवा भक्ति भावावेशमूलक मान्यताओं के दायरें बाहर निकल कर साधक अनुभूति के स्तर पर यथार्थ की भूमि पर कदम रखता है । जो सत्य है उसे केवल मान कर नहीं रह जाता उसे जानता है जनाति और प्रज्ञापूर्वक जानता है पजानाति । साक्षीभाव से तटस्थ भाव से बिना राग के, बिना द्वेश के बिना मोह के यथाभूतः जैसा है वैसा, उसके सत्य स्वभाव में, यथार्थ को जानता है । मात्र जानता है । कोई प्रतिक्रिया नहीं करता, न उसे दूर करने की न उसे रोके रखने की । केवल दर्शन, केवल ज्ञान यही है पजानाति ।
बाहर का आंलंबन चाहे जो हो , अपने भीतर कामवासना जागी तो बाहर के आलंबन को गौण मानकर अपने भीतर की अनुभूतिजन्य सच्चाई को जानने का अभ्यास साधक शुरू कर देता है । सन्तं वा अज्झत्तं कामच्छन्दं- जब भीतर कामतृष्णा है तो अत्थि मं अज्डद्यझत्तं कामच्छन्दोति पजानाति - मेरे भीतर कामवासना याने कामतृष्णा है यह प्रज्ञापूर्वक जानता है प्रज्ञापूर्वक इस माने में भी कि यह अनित्य स्वभाव वाली है अनंतकाल तक बनी रहने वाली नहीं । इस समझदारी के साथ तटस्थभाव बनाए रखता है । उसे दूर करने की जा भी कोशिश नहीं करता, अन्यथा दमन के एक अंत की ओर झुक जाएगा । और न हीं उसे वाणी और शरीर पर प्रकट कोने की छूट देता हैं अन्यथा आग में घी डालने वाले दूसरे अंत की ओर झुक जाएगा । उसके अनित्य सवभाव को समझते हुए केवल जानता है पजानाति । क्योंकि अब उसे बढ़ावा नहीं मिल रहा, इस सच्चाई को भी महज साक्षीभाव से प्रज्ञापूर्वक जान लेता हैं असंन्तं वाअज्झत्तं कामच्छन्दं - नहीं है भीतर कामछंद तो , नत्थि में अज्झत्तं कामच्छन्देति पजानाति - मेरे भीतर कामछंद नहीं हैं , इस सच्चाई को प्रज्ञा पूर्वक तटस्थभाव से जानता है । और क्योंकि विष्यना कर रहा है तो सतिमुट्ठा नहीं हुई , सतिपट्ठान का अभ्सायी है याने, अपने भीतर नामरूप याने चित्त और शरीर के प्रंपच को प्रज्ञापूर्व अनुभूति के स्तर पर जानने को काम कर रहा है । इसी को सति के साथ सम्पजञ्ञ को जोड़ना कहते हैं ।

शरीर चित्त का प्रपंच वेदनाओं के रूप में प्रकट होता है । साधक मानस पर जागी हुई संवेदनाओं को तटस्थभाव से देखत है । ये संवेदनांए अतंर्मन से जुड़ी रहती हैं अतः मन की उदीरणा शुरू हो जाती है । इन पूर्व संचित अनुत्पन्न कामवासनाओं का उत्पाद शुरू हो जाता है यथा च अनुप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स उप्पादो होति तत्च पजानाति । और उदीर्ण हुई इस चिरसंचित कामवासना को भी साक्षीभाव से संवेदनाओं के स्तर पर देखते रहता है तो उन पुराने संस्करों की परत पर परत उतरते हुए उनकी निर्जरा होती जाती है , उनका क्षय होते जाता है । यथाच उप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स पहानं होततिञ्च पजानाति - यों उदीरणा और निर्जरा होते होते प्रहाण क्षय होते होते एक समय ऐसा आता है, जब कि अंतर्मन की गहराई तक के कामतृश्णा के सारे संस्कार उखड जाते हैं उनका नाम लेख तक नहीं रहता । अब कोई कामवासना जागती हीं नहीं । न किसी वर्तमन के आलंबन के कारण और न कोई पुराने संग्रह में से । यथा च पहीनस्स काच्छन्दस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति । साधक परम मुक्त अवस्था तक पहुँच जाता है ।
जो परिश्रम करे , वही इस मुक्त अवस्थात क पहुँचे । किसी भी जाति का हो, वर्ण का हो, रंग रूप हा हो , देश विदेश का हो, बोली भाषा का हो जो करे वही मुक्त । जो न करे उसे लाभ कैसे मिले भला । कोई कोई इसीलिए नहीं करता कि यह तो हमारी पंरपरागत दार्शनिक मान्यता के अनुकूल नहीं है हम क्यों करें । कोई कोई इसलिए नहीं करता कि यह हमारी मान्यता कितनी महान है । इस गर्व गुमान में ही संतुष्टि कर लेता है । मान्यताओं में उलझे हुए लोग विपश्यना नहीं कर सकते , इससे लाभान्वित नहीं तो सकते । करें तो लाभान्वित होंगे ही । ।

Ten Days Of Vipassana | By Sandeep Maheshwari

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Run Machine Mayank Agarwal Finally Gets His Due Reward

Since the start of the previous season, Agarwal has 1615 runs from 14 matches, with more centuries (6) than fifties (4). Since November 1 2017, he has scored more first-class runs (1584) than anyone else in the world. It includes 1160 runs in the previous Ranji Trophy at an incredible average of 105.45. Add to it 723 Vijay Hazare Trophy runs, and here was a batsman who was bull-dozing himself to national recognition like no other in recent times.

Interestingly, it all started with a pair. Agarwal scored just 31 in his first Ranji knock last season, and followed it up with two zeroes in the game against Hyderabad in Shimoga. Who knows, his place in the Karnataka XI might not have been assured had KL Rahul, who featured in the Shimoga game, been available for the next.

But Rahul had national duties to attend, and Agarwal’s place wasn’t in question. He ensured it would never be in doubt in his very next knock, smashing an unbeaten 304 against Maharashtra in Pune. It was the beginning of November, and also a new life for Agarwal.

“To be honest, I wasn’t sad after the pair because all my team-mates supported me,” Agarwal had told Wisden India last year. “If anything, I was happy with how much they backed me. Everyone ensured that the vibe around me was positive, and that reflected in how I batted thereafter. Actually, I could not have had a better thing happen to me in my life. I was working on letting go for some time and this was the perfect opportunity for me to truly experience it. I just let go and focussed on facing the next ball, and that’s how the triple happened.”

He didn’t stop with the triple. By the end of November, he had scored a record 1033 runs in less than a month. The turnaround was an accumulation of all the hard-work he had put in through the previous two seasons. He worked on his skills and improved on his ability to bat time with his individual batting coach RX Murali. Agarwal also had Vipassana to turn to, to help with his mind-set.

Source: https://www.news18.com/cricketnext/news/india-vs-west-indies-run-machine-mayank-agarwal-finally-gets-his-due-reward-1894635.html

मृत्यु मंगल

विपश्यना साधक के लिए मृत्यु मंगल है, अमंगल नही । सुहवनी है, भयावनी नही। अभिनंदनीय है, तिरस्करणीय नही । जब समय पकता है और आयु संस्कार पुरे होते है तो शरीर-च्युति अवश्यंभावी है । नियती के इस अटूट नियम को कोई नही टाल पाता । परिपक्व साधक इस अपरिहार्य मृत्यु क्षण को मुस्कुराता हुआ वरण करता है ।  चित्तधारा पर रंचमात्र भी भय नही होता, शोक नही होता, घाबराहट नही होती । मृत्यु के समय यदि पिडाए हो तो भी चित्त विचलित नही होता । जैसे अधिष्ठान मे बैठा हुआ शारीरिक पीडाए हो तो भी चित्त विचलित नही होने देता वैसे ही यदि मृत्यु के समय पिडा हो तो भी अविचलित रहता है । सजग सचेत रहता है । अनित्य बोध की चेतना बनी रहती है । ऐसे चित्त-क्षण जब च्युति होती है याने शरीर छुटता  है तो आगले क्षण की प्रतिसंधी याने आगले जीवन का प्रथम चित्त निःसंदेह किसी सद्गती के क्षेत्र मे ही होता है, दुर्गती की किंचित भी आशंका नही । 


जो साधक जब से विपश्यना मिली तब से लेकर शेष जीवन पर्यंत विपश्यना का अभ्यासी रेहता है, वह सदधर्म का पथिक है "ओपनेईको" स्वभाव मृत्यु के क्षण सहाय्यक बनकर उपस्थित हो ही जाता है ।  उन्नत भविष्य सुरक्षित होता है । सद्गती सुनिश्चित होती है ।

इसीलिये सच्चे साधक को मृत्यु का भय नही रहता । वह ना तो जीवन से घृणा करता हुआ मृत्यु की कामना करता है और न ही जीवन से आसक्त होकर मृत्यु से घबराता है । पूर्णतया विश्वस्त रहता है की मृत्यु पदन्नोती है, प्रोमोशन है । अंतः प्रसन्नता का विषय है, शोक का नही , विलाप का नही । विपश्यना साधक जीवन जिने की कला सिखता है । जीवन जिने की कला मे ही मंगल मृत्यु की कला समायी हुई है । फिर भी मरणासन्न विपशयी के निकट जो अन्य साधक हो उन्हे उसकी सहायता करनी चाहिए । सारे वातावरण को समतामयी धर्म चेतना से परिप्लावित रखना चाहिए । यदि कोई अस्थिर चित्त और दुर्बल हृदय का आंसु बहानेवाला व्यक्ती पास हो तो असे सिग्र दूर हट जाना चाहिए ताकि वह मरणासन्न व्यक्ती बहुत पका न हो तो कही अपने परिवार के किसी व्यक्ति को शोकाकुल देखकर स्वयं शोकग्रस्त न हो जाय और अपना परलोक न बिघाड ले । सभी उपस्थित साधको को चाहिये की उस समय मरणासन्न व्यक्ति के आस-पास बैठकर विपश्यना करें । अनित्यबोधनी-चेतना की धर्म तरंगो का प्रजनन करे अथवा रोगी के प्रति मंगल मैत्री करें । उस समय सारा वातावरण धर्म चेतना की विद्युत तरंगो से ही उर्मिल रहना चाहिए । 

मृत्यु के पश्चात कोई भी रोए नही, विलाप नही करे । बल्की मृतक की सद्गती पर चित्त को प्रसन्न ही रखे । उसके प्रति मंगल मैत्री ही प्रजनन करे । उसे अपना पुण्य वितरण ही  करें । इससे मृतक व्यक्ति जहाँ कही जन्मा हो , उसकी चित्तधारा मे धर्म चेतना का ही स्पर्श होता रहे, और परिणामतः उसकी चित्त चेतना प्रशांत, प्रसन्न, प्रफुल्ल रहती रहे । शोक और विलाप करने से अपने चित्त की दुःखजन्य तरंगे  अपने प्रिय मृत व्यक्ती की चित्तधारा को शोक संतप्त करती है । उसे व्याकुल बनाकर उसकी सुख शांती का हनन करती है । न स्वयं शोक संकुल हो और न ही किसी अन्य के शोक का कारण बने । स्वयं प्रसन्न चित्त रहे और अन्य की चित्त-प्रसन्नता का भी कारण बने । मंगल मृत्यु का यही विधान है । 

- मंगल मित्र सत्यनारायण गोयंका 
साभार - विपश्यना पत्रिका वर्ष ९, अंक १२

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भगवान बुध्दांचा अस्थी कलश सन्मानपूर्वक प्रतिष्ठापित करण्यासाठी व्दितीय बुद्धशासनाचे जागतिक अभियान


सब्बे बुद्धास बिंबे सकळ दसदिसे केस लोम दि धातू वन्दे, सब्बे पी बुधन्ग दसबल तनुंज ,बोधी चेतीय नमामि,वन्दामी चेतीय सब्ब सब्ब धनेसु पदेठीत ,सारिरीक धातू महाबोधी बुद्ध रूप सकल सदा.

 सर्व धर्म बांधवानो,आपण सर्व विपश्यना साधक आहात,या विपश्यना साधनेतूनच आपण निर्वाण प्राप्ती करू शकतो, केवळ पुस्तकी ज्ञानाने नाही ,तरी ध्यान साधना पुष्ट होण्यासाठी आणि भगवान बुद्धांच्या प्रति अपार श्रद्धा दाखवण्याची संधी आपल्याला विपश्यना सेवक संघातून मिळणार आहे ,बुद्धांच्या अस्ति धातु हे दिल्लीत संग्रहालयात ठेवण्यात आले आहेत तरी ते आपल्याला मिळवून त्याना सर्वोच्च स्थानी ठेवून सर्व मानवाला त्याचा लाभ व्हावा या करिता आपल्या सर्वांनी एकत्र येण्यासाठी आणि धातूंची मागणी करण्यासाठी विपश्यना सेवक संघाचे सभासद व्हा. 

सतत ७ वर्ष गोयंका गुरुजी त्यानंतर आता विपश्यना सेवक संघ अथक प्रयत्न करीत आहे आणि ही जबाबदारी फक्त आमच्या एकट्याची नसून ज्या कोणाला बुद्धावर अपार श्रध्दा आहे आणि आपले पुण्यबळ वाढवायचे असेल अश्या सर्वांनी मनापासून प्रयत्न करून आपली मागणी मान्य करायला लावूया,एकट्याने हे होणार नाही सर्वांनी सहकार्य करावे, विपश्यना सेवक संघ च्या मार्फत हे करू,आणि हि बाब प्रत्येकाला सांगू,जेणेकरून सरकार जागे होईल,शेवटी ते पण माणसंच आहेत त्यांना जाणीव करून देने आपले काम आहे,ज्यांना काही सुचवायचे असेल तरी कळवा,कारण उद्देश नेक आहे एका पायांनी चालण्यापेक्षा कोटी पावलांनी लवकर पोहचू,















शैलेंद्र तांबे,8097736611
सूचना :- सामूहिक ध्यानसाधना विपश्यना सेवक संघाच्या कार्यलयात चालू करण्यात आली आहे ज्यांना कोणाला साधनेत सहभाग घेण्याची इच्छा असेल त्यांनी संपर्क साधावा.

संपर्क- 
आयु. गौतम गायकवाड- संस्थापक अध्यक्ष

आयु. गौतम साळवी

प्रेमसागर गवळी 
मो. 9923060664

*विपश्यना सेवक संघ ऑफिस*
स्थळ:- *इ/३ मुलुंड सहकार विश्व को. ऑप. हौ. सोसायटी नाहूर रोड, जैन मंदिराच्या बाजूला, मुलुंड पश्चिम, मुंबई-४०००८०*
ई-मेल - vssigp@gmail.com
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One Day Mega course at Global Pagoda Mumbai on 9th July 2017

Guru Purnima 2017 One Day Mega Course in Gorai, Mumbai at Global Vipassana Pagoda on Sunday, 9th July 2017 from 11:00 am to 4:00 pm


Important Guidelines:

1. The One Day Mega Vipassana Meditation Course is only for old students who have successfully completed atleast one 10-Day course with S.N. Goenkaji and his teachers in tradition of Sayagyi U Ba Khin.

2. There is no facility available for overnight stay of one-day course students at the Global Pagoda. This applies to those coming from out of Mumbai too. A cloak room service will be available on the day of the course for temporary storage of any baggage.

3. Children are not permitted inside the Global Vipassana Pagoda. Meditators are specifically requested not to  bring their children to 1-Day Mega Courses. This even applies to children who may have attended children's Anapana courses.

4. All meditators are required to get a photo identity card such as driving licence, voter ID card or passport. This is mandatory for security check by the police at the pagoda site.

5. Meditators are requested to bring your own water bottles, which can refilled at the Pagoda. They should switch off their mobile phones and observe noble silence during the course.

6. It is also requested that you bring a small cloth to put on top of your cushion. This will help you in locating your own cushion after a break.


Advance Registration for these one-day courses is compulsory. Your advance registration helps us in making adequate arrangements for those attending the course. Hence we request you to register yourself by any of the following methods. Even if you wish to give Dhamma seva at this course, please do register yourself. In case you are unable to attend the course, please do send a cancellation email or call and inform.

You can register by using one of the following methods:

a) By calling on any of these phone lines - (10.00 am to 6.00 pm from Monday to Sunday.)

02233747529
02233747544
02233747501 - ext No 9

b) By visiting the Global VIpassana Pagoda website and making an online registration :  http://oneday.globalpagoda.org

c) By sending an Email to  oneday@globalpagoda.org



Regular One Day courses - held every Sunday

The Regular One Day Vipassana Meditation Course is only for old students who have successfully completed atleast one 10-Day course with S.N. Goenkaji and his teachers in tradition of Sayagyi U Ba Khin. One-day courses are conducted every Sunday from 11 am to 4 pm in the Main dome of Global Vipassana Pagoda. Registration is done on the spot at the Gate No. 5 of Global Vipassana Pagoda.



For more information visit - www.globalpagoda.org

मानवाच्या कल्याणाचा मार्ग : विपश्यना


भगवान बुध्द हे महान मनोवैज्ञानिक आणि संशोधक होते. त्यांनीच ही *विपश्यना* विधी अडीच हजार वर्षापूर्वी शोधून काढली. *विपश्यना* भगवान बुध्दांच्या शिकवणुकीचा सार आणि गाभा आहे. त्यांनी संशोधीत केलेल्या सत्य आणि प्रज्ञेचा प्रत्यक्ष अनुभव या अभ्यासानेच घेतलेला आहे. म्हणूनच त्यांनी आपल्या शिकवणुकीत *ध्यानावरच* विशेष भर दिला आहे.
*विपश्यना* ही ध्यानविधी अगदी सोपी आणि साधी आणि तितकीच अवघड असून अद्वितीय आहे. ती एक निखळ सुख आणि मन:शांती मिळवून देणारी तर्कसंगत अशी साधना आहे.
या साधनेच्या अभ्यासाने स्वत:च्या शरीर व मनात खोलवर दडलेल्या समस्यांची उकल होऊन, त्या दूर होण्यास मदत होते. आपल्यामधील सुप्त शक्तींचा विकास होतो. त्या शक्तीचा उपयोग स्वत:च्या व इतरांच्या कल्याणासाठी करता येतो. या साधनेद्वारे केवळ शारीरिक समस्या दूर होतात, असे नाही तर जीवनात मोठा क्रांतीकारी मानसिक बदल सुध्दा घडून येतो.
ही कल्याणकारी विद्या भारतातून जगात पसरली. गुरु-शिष्य परंपरेच्या माध्यमातून ही विद्या ब्रम्हदेशात मागील 2500/2600 वर्षांपासून परम परिशुद्ध स्वरूपात जतन करण्यात आली.
परमपुज्य सत्यनारायन गोयंका गुरुजी यांनी ही विधी ब्रम्हदेशातून भारत देशात आणून नाशिक जवळील इगतपुरी येथे व देशातील आणि जगातील इतर अनेक ठिकाणी दहा दिवसाच्या शिबिरातून प्रशिक्षित आचार्यांच्या माध्यमातून शिकवीत आहेत.
*विपश्यना शिबिरात* पहिला अभ्यास *आनापानसतीचा* (श्वासा चे निरीक्षण) व दुसरा *विपश्यना* (स्वत:च्या शरीरातील प्रत्येक पेशीत उमटणार्‍या संवेदनाचे निरीक्षण) आणि तिसरी *मंगल मैत्री* (विश्वातल्या सर्व प्राण्यांप्रति मंगल भाव करणे) शिकवले जाते.
*आनापानसती विपश्यनाचा* प्रारंभीक भाग आहे. ही एक प्राथमिक क्रिया आहे. म्हणून या शिबिरात सुरुवातीला *आनापानसती* शिकवून मनाच्या एकाग्रतेचा अभ्यास आणि सराव केल्या जाते. हा अभ्यास *विपश्यना* साधनेची पूर्वतयारीच असते. आन म्हणजे अश्वास, अपान म्हणजे प्रश्वास व सती म्हणजे सजगता. म्हणजेच येणार्‍या व जाणार्‍या श्वासावर लक्ष ठेवणे. म्हणजेच या अभ्यासात शरीरात नाकावाटे सहज आणि स्वाभविक येणारा तसेच बाहेर पडणारा श्वासावर लक्ष केंद्रित केल्या जाते. आपले मन जागृत ठेवले जाते.
*विपश्यनाला* पाली भाषेत *विपस्सना* म्हटले जाते. त्यात वि आणि पस्सना असे दोन शब्द आहेत. वि म्हणजे विशेष रुपाने आणि पस्सना म्हणजे जाणणे, पाहणे किवा अनुभूती घेणे. म्हणजेच जग जसे आहे तसे पाहणे. जगाची वास्तवता समजून घेणे. सर्व बाबींना त्यांच्या मुळ गुण-धर्म-स्वभावात पाहाणे (सत्यदर्शन) म्हणजे *विपश्यना*.
या विधीत आपल्या स्वत:च्या शरीरात उत्पन्न होणार्‍या सर्वसामान्य, नैसर्गिक संवेदनाचे पध्दतशीर व नि:पक्षपातीपणे निरीक्षण केल्या जाते. कारण संवेदनाच्या आधारेच आपल्याला प्रत्यक्ष सत्याची अनुभूती होते. *विपश्यना* करतांना शरीर आणि मनाचे संपूर्ण सत्य अनुभवाच्या पातळीवर समजून घेतल्या जाते. *विपश्यनामुळे* मनाच्या खोल गाभ्यात बदलांची प्रक्रिया सुरु होते.
कोणत्याही समस्येचे मूळ आपल्या मनात असल्याने तिच्याशी मानसिक स्तरावरच सामना केला पाहिजे. म्हणून *विपश्यनेच्या* माध्यमातून मनावर संस्कार करण्याचा अभ्यास *विपश्यना* शिबिरात शिकविले जातात. हा अभ्यास अत्यंत गांभिर्याने, नैसर्गिक वातावरणात आचार्याच्या मार्गदर्शनात भारतात आणि परदेशात वैज्ञानीक पद्धतीने शिकविल्या जाते.
मन हे सतत भरकटत असते. चवताळलेला हत्ती काहीही नुकसान करू शकतो, पण त्याला जर काबूत ठेवले तर तो चांगल्या कामात उपयोगी पडू शकतो.
तसेच मनाचे आहे. मनाला काबूत ठेवण्यासाठी *विपश्यना* हे एक चांगले साधन आहे. आपले चित्त, मन एखाद्या गोष्टीवर अथवा कार्यावर एकाग्र करणे, त्या कार्याप्रती पूर्णपणे जागृत राहणे व ते कार्य सर्वशक्तीनिशी पार पाडणे हे *आनापानसतीचा, विपश्यनाचा आणि मंगल मैत्री* चा अभ्यास करणारे चांगल्या रीतीने करू शकतात.
ह्या अभ्यासाने आपले जीवन किती अनित्य आहे, क्षणभंगुर आहे. या गोष्टीची अनुभूती च्या स्तरावर जाणीव होत असते. म्हणून या ध्यानात एकाग्रता, जागरूकता व प्रज्ञा या गोष्टींचा लाभ होतो.
सत्याच्या अनुभूतीचा एकमेव मार्ग म्हणजे स्वत :च्या अंतर्मनाचे आपण स्वत:च केलेले निरीक्षण होय. म्हणून भगवान बुद्धांनी सांगितलेला हा मार्ग आत्मनिरीक्षणाचा, स्वत:ला शास्त्रीय पद्धतीने तपासण्याचा मार्ग आहे. त्यामुळे आपल्या स्वत:च्या स्वभावाचे ज्ञान करून आपल्यामधील दोष, विकार नष्ट करता येतात. अंतर्मनातील अंधकार दूर करता येते. निसर्गाचे नियम अनुभवातून समजून घेता येते. या अभ्यासाने दु:ख, प्रक्षुब्द व ताणतणाव निर्माण करणारे कारणे शोधून त्याला नष्ट करता येतात. त्यामुळे आपले मन शुध्द, शांत व आनंदी होत जाते.
भगवान बुध्दांनी आपल्या मनाच्या तीक्ष्ण एकाग्रतेने आपल्या मनाच्या खोलीत शिरून सत्याचा तळ गाठला. त्यांना आढळले की, आपले शरीर अत्यंत लहान लहान परमानुंचे बनले आहे. ते सतत उत्पन्न होवून नष्ट होत असतात. म्हणजेच जीवनाच्या अनित्यतेची जाणीव होते. अनित्यतेची जाणीव झाल्याने मनुष्य कुशल कर्मे करण्याकडे वळतो. स्वतःतील दोष कमी करण्याचा प्रयत्न करतो. आपल्या मनातील राग, द्वेष, मोह, तृष्णा, वासना, लोभ, भय इत्यादी विकार दूर होऊ लागतात. उर्वरित आयुष्य दु:खात घालविण्यापेक्षा सुख आणि आनंदात जाते. असे अनेक फायदे *विपश्यना ध्यान साधनेने* मनुष्याला प्राप्त होतात.
शरीरातील प्रत्येक कण परिवर्तनीय व बदलत असल्याने ‘मी’ ‘माझा’ असे म्हणावे असे काहीच स्थिर राहात नाही, हे सत्य साधकाच्या लक्षात येते. त्यामुळे अनात्मतेचा बोध होतो. आणखी एक सत्य साधकाला स्पष्ट होते ते असे की, ‘मी’ व ‘माझे’ ची आसक्ती हीच तर दु:ख निर्मिती चे कारण आहे. ह्या सार्‍या गोष्टी कोणी सांगितले म्हणून नव्हे तर आपल्या स्वत:च्या अनुभवावरून संवेदनाच्या निरीक्षणामुळे समजू लागतात.
या अभ्यासात शिकविले जाते की, शरीरात उमटणार्‍या संवेदनावर कोणतीही मग ती सुखद असो, दु:खद असो की, सुखद-दु:खद असो – प्रतिक्रिया व्यक्त न करता नि:ष्पक्ष राहून केवळ निरीक्षण केल्याने दुखा:च्या आहारी जात नाही. कारण संवेदना सतत बदलत असतात. त्या कायम राहत नाही. उदय होणे, व्यय होणे हा तिचा नैसर्गिक स्वभाव असल्याचे जाणवते. म्हणून सजगता व समतेत राहिल्याने आपण दुख:मुक्त होऊ शकतो, ही गोष्ट साधकाच्या लक्षात येते.
तसेच प्रत्येक संस्कार उत्पन्न होते, लय पावते. ते परत उत्पन्न होते, लय पावते. ही क्रिया सतत सुरु राहते. आपण प्रज्ञेचा विकास करून तटस्थपणे निरीक्षण केल्यास, संस्काराची पुनर्निर्मिती थांबते. आताच्या आणि पूर्वसंचित संस्काराचे उच्चाटन झाले की, आपण दुख:मुक्तीचा आनंद उपभोगू शकतो, हेही साधकाच्या लक्षात येते.
संवेदनापासून तृष्णे ऐवजी प्रज्ञाच विकसित होते. प्रज्ञेमुळे दुखा:ची साखळी तुटते. राग व द्वेषाच्या नवीन प्रतिक्रिया निर्माण होत नाहीत. त्यामुळे दुख: निर्माण होण्याचे कारणच उरत नाही. मनाच्या दोलायमान स्थितीत घेतलेले निर्णय ही एक प्रतिक्रियाच असते. ती सकारात्मक कृती राहत नसून ती एक नकारात्मक कृती बनते.
ज्यावेळी मन शांत व समतोल असते. तेव्हा घेतलेले निर्णय हे कधीही दुख:दायक नसतात तर ते आनंददायकच असतात. जेव्हा प्रतिकिया थांबतात, तेव्हा तणाव दूर होतात. त्यावेळी आपण जीवनातील खरा आनंद उपभोगू शकतो, याची साधकाला प्रचीती येते.
आपण सुखी व आनंदित झालो की, असेच सुख आणि आनंद दुसर्‍यालाही मिळावे म्हणून कामना करतो. सर्वांचे कल्याण होवो, सर्व दुख:मुक्त होवोत, हीच तर *विपश्यना ध्यान साधनेचा* उद्देश आहे. यालाच *मेत्ता भावना* म्हणजेच ‘मैत्री भावना’ म्हणतात.
भगवान बुद्धांनी या अभ्यासाद्वारे जाणले की, मनुष्याला होणारे दु:ख हे काही दैवी कारणाने होत नसते. तर त्याला जसे इतर कोणत्याही गोष्टी कारणाशिवाय घडत नाहीत, तसे दु:खाला सुध्दा कारणे आहेत.
भगवान बुद्धांनी अखिल मानवाला दु:खमुक्त होण्यासाठी चार आर्यसत्य व अष्टांगिक मार्गाची शिकवण दिली. चार आर्यसत्यामध्ये दु:ख. दु:खाची कारणे, दु:खाचा निरोध आणि दु:ख नष्ट करण्याचा मार्ग म्हणजेच आर्य अष्टांगिक मार्ग यांचा समावेश आहे.
अष्टांगिक मार्गामध्ये १. सम्यक दृष्टी, २. सम्यक संकल्प, ३. सम्यक वाचा, ४. सम्यक कर्म, ५. सम्यक आजीविका, ६. सम्यक व्यायाम, ७. सम्यक स्मृती व ८. सम्यक समाधी याचा समावेश होतो. आपले शरीर निरोगी ठेवण्यासाठी जसे शारीरिक व्यायाम करतो, तसेच मनाला निरोगी ठेवण्यासाठी मनाचा व्यायाम म्हणजे ही *विपश्यना* साधना होय.
जागतिक आरोग्य संघटनेने म्हटले आहे की, जो व्यक्ती शरीराने आणि मनाने निरोगी आहे, अशा व्यक्तीला सुदृढ आणि सक्षम म्हटल्या जाते. *विपश्यना* साधनेमध्ये मानवी मन हे केंद्रस्थानी आहे. शरीरावर होणार्‍या प्रतिक्रिया ह्या मनातून निर्माण होतात. म्हणून मन हे निरोगी असेल तरच शरीर निरोगी राहण्यास मदत होते.
ही वैज्ञानीक साधना शिकण्यासाठी विविध भाषा, जाती, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग असलेले लोक मोठ्या प्रमाणात आकर्षित होत आहेत. त्यामुळे जातीय सलोखा निर्माण होण्यात या विधीचा मोठा हातभार लागत आहे.
आज दहशतवाद व अण्वस्त्राच्या भीतीने जगात अशांतता व अस्वस्थता निर्माण होत आहे. तेव्हा जगात शांतता नांदण्यासाठी *विपश्यना* विधीची फार मोठी मदत होत आहे. जगात ठिकठिकाणी *विपश्यना* केद्रे स्थापन होत आहेत. त्यामुळे ह्या विधीचा सार्‍या जगात झपाट्याने प्रसार होत आहे.
भारतातील पहिल्या महिला आय.पी.एस. अधिकारी किरण बेदी यांनी *कैद्यांसाठी विपश्यना* अभ्यासाची व्यवस्था केली होती. त्यामुळे गुन्हेगारी जग सुधारण्यास या विधीचा उपयोग होत आहे.
शासन त्यांच्या अधिकार्‍यांना ही विद्या शिकता यावी म्हणून *विपश्यना* शिबिराला पाठविण्याची व्यवस्था करीत आहेत. प्रशासकीय कामे करतांना मानसिक तणाव दूर होतो. ही विधी शिकतांना भगवान बुद्धांनी सांगितलेला शील-समाधी-प्रज्ञा तसेच पंचशीलेची शिकवण मिळत असल्याने साधक वर्ग नीतीमान बनत असतो. त्यामुळे भ्रष्टाचाराला वाव राहत नाही. वक्तशीरपणा, प्रामाणीकपणा हे गुण साधक वर्गात वाढीस लागत आहेत.
लहान मुलांपासून ते मोठ्या माणसापर्यंत आज शिबिरे आयोजीत होत आहेत. त्यामुळे मैत्री, करुणेचे भगवान बुध्दाचे तत्वज्ञान जनमानसात रुजत आहेत. सामाजिक सलोखा निर्माण होण्यास तसेच आजच्या अनैतिक जगात माणसाला सदाचारी, चारीत्रवान, निरोगी बनविण्यासाठी या विधीचा फार मोठा हातभार लागत आहे.
*विपश्यनेचा* व्यक्तिगत दृष्टीने नियमित अभ्यास केल्याने मनातील राग, द्वेष, मोह, तृष्णा, वासना, लोभ, भयं असे विकार नष्ट होतात. त्यामुळे दु:ख आणि विकारातून मुक्त होवून मानवाचे कल्याण होते. तसेच सामाजिक दृष्टीने विशुद्धी, पावित्र, सदाचार, नैतिकतेचा पाया मजबूत होवून समाजविकास घडून येतो.
आज जगासमोर उपासमार, गरिबी, जातीयवाद, हिंसाचार, दहशतवाद, हुकूमशाही, युध्दजन्य परिस्थिती असे जे भयावह स्थिती दिसत आहेत, त्याला शांत करण्यासाठी भगवान बुध्दाचे समता, स्वातंत्र, बंधुत्व व न्याय तसेच अहिंसा, प्रज्ञा, शील, करुणा व मैत्रीचे तत्वज्ञान म्हणजेच *विपश्यना विधी* हेच एकमेव उत्तर आहे. म्हणून *विपश्यना* साधना ही मानवी कल्याणाचा मार्ग आहे.
आपण सर्व *विपश्यना* करा, नियमित पणे करत रहा, आणि जास्तीत जास्त लोकांना *विपश्यना* साठी प्रेरीत करा, करित रहा.

विपश्यना सेवक संघ

राजकुमार सिध्दर्थ गौतम ने लोक कल्याण के लिये दु:ख -मुक्ति का मार्ग खोजकर विश्व मेँ सुख-शांति निर्माण की। उनकी  विश्वकल्याणकारी विपश्यना विद्या शुध्द रुप मे जैसी थी वैसे हि लोक कल्याण  करती रहे और उसका रक्षण हो, विपश्यना विद्या के संदर्भ मेँ शुध्द चर्चा  हो, इस उद्देश से विपश्यना सेवक संघ का निर्माण किया है।



Vipassana prime Teacher S.N. Goenkaji


Satya Narayan Goenka (30 January 1924 – 29 September 2013), commonly known as S.N. Goenka, was a Burmese-Indian teacher of Vipassanā meditation. Born in Burma to a rich Indian family, he moved to India in 1969 and started teaching meditation. His teaching was notable for emphasizing that the Buddha's path to liberation was non-sectarian, universal, and scientific in character. 

He became an influential teacher and established meditation centers worldwide.[1][2] In November 2008, the construction of the Global Vipassana Pagoda was completed on the outskirts of Mumbai. Goenka was an invited speaker at the Millennium World Peace Summit of Religious and Spiritual Leaders on 29 August 2000 at the United Nations in New York City.[3] He was awarded the Padma Bhushan by the Government of India in 2012.

सुखी जीवनासाठी बुद्धांच्या विचाराची गरज - डॉ. दत्ता कोहिनकर

आजच्या ताण तणावाच्या स्पर्धेच्या युगात माणूस नुसता पळत सुटला असुन तो स्वतःकडे दुर्लक्ष करू लागला आहे. त्यामुळे शारीरिक व मानसिक व्याधींचे प्रमाण प्रचंड वाढले असुन त्याचा सामना न करता आल्याने आत्महत्येचे प्रमाण दिवसेंदिवस वाढत आहे. यासाठी बुद्धांच्या मध्यम मार्गाला व विचारांना आत्मसात करण्याची गरज आहे.